Saturday, July 25, 2020

खुली आँखों से जलता मेहताब देखोगे 
सर्द हवाओं से लड़ते चराग़ देखोगे 
अभी तो बस कलम उठायी है 
स्याही में बहते सैलाब देखोगे 

                     - अजय गौतम 'आहत '


Friday, July 17, 2020

अन्तर्यात्री

विचार
मथते रहते है
बात करते रहते हैं
मस्तिष्क के पता नही किस कोने से उठकर
दावानल की तरह पूरा जंगल घेर लेते हैं।
समुद्र की शांत थपकी देती लहरों जैसे,
सरल आवृत्ति गति
झूले की तरह हिलोरें लेते
गहराई तक जाकर टटोलते है
अरे बची है कुछ ऊर्जा,
और खंगालूँ?
सारी अंतःशक्ति सोखकर
सुनामी की तरह निकलते हैं
बाहर शांत
अंदर ऊंची लहरों के प्रचंड वेग
मस्तिष्क लांघकर
स्वयंभू सोचते है
भस्म कर दूं पूंजीवाद
उड़ा दूँ साम्यवाद के परखच्चे
नष्ट कर दूं जाति
दफन कर दूं जातिवाद
काट दूं बेड़ियां स्त्रियों की
सरल कर दूं सब वाद।

लहर छलांग मार
आकाश गंगा हो जाना चाहती है
जैसे बच्चे लंगड़ी उछलकर खेलते हैं
मंगल, शनि, प्लूटो
सबको वैसे ही टापूं,
साक्षात बुद्ध के साथ ध्यान लगाऊं
ज्ञान लूं।
कोपरनिकस का हाथ चूम लूं
गैलीलियो की आंख चूम लूं
न्यूटन और आइंस्टाइन दोनो को
एक साथ बिठाकर तर्क करूँ
या चुपचाप मंत्रमुग्ध होकर उनको
बहस करते देखूँ।
हॉकिंग का व्हीलचेयर
मुझे टाइम-मशीन लगता है,
उसमे बैठकर
अम्बेडकर की जीवन यात्रा
देखूं ।

विचार उड़ने देते हैं
सोने नहीं देते।

       -- अजय गौतम 'आहत'


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Wednesday, July 1, 2020

पंखुड़ियाँ - My Book

दोस्तों मेरी प्रथम किताब   "पंखुड़ियाँ"   प्रकाशित हो चुकी है। आप लोगो की ढेर सारी बधाईयों के लिए बहुत बहुत धन्यवाद।  लॉक डाउन के कारण कई मित्रों को डिलीवरी थोड़ी देर से मिली। लेकिन अब इसकी दिक्कत दूर हो चुकी है। 
कई मित्रों का फेसबुक और अमेज़न पर फ़ीडबैक और review भी मिला। बहुत शुक्रिया। आपको पसंद आई।🙏 

'पंखुड़ियाँ'  काव्य-संकलन है। जैसे सागर  कभी उथल-पुथल तो कभी चिर-शांत रहता है, कभी तूफानों को समेटे रहता है तो कभी मद्धिम शीतलता को ओढ़े रहता है। ठीक वैसे ही प्रेम रूपी सागर जड़- चेतन के विभिन्न आयामों से गुजरता है।  
पंखुड़ियाँ इस सागर में डूबने, ठहरने, टूटने और उबरने की प्रक्रिया का संकलन है। एक यात्रा है। ये यात्रा शायद हर कोई करता है । कभी न कभी। इन यात्रा के जल-चिन्हों  को शब्दांकित करने का सूक्ष्म प्रयास है 'पंखुड़ियाँ'. 

जब आप पढ़ेंगे तो ये शब्द, अनुभव, अभिव्यक्ति, ये किताब सब आपके हो जायेंगे। आपके अपने। 

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दिल के मारियाना ट्रेंच की तलहटियों से धन्यवाद !❤️

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Monday, June 8, 2020

गज़ल

दूर है तो क्या दिल से तो करीब है
जाने क्या क्या बहाने बनाते हैं लोग

अजब सी खामोशी है तेरे शहर में
दरख्तों से झांक छिप जाते हैं लोग

वो भूखा दो जून की रोटी मांगता है
उसी का गला क्यूं दबाते है लोग

वोट दिया है तो हिसाब मांग ले
कौन है जिसको बचाते हैं लोग

चिड़ियों को सलाह से अब कोई न वास्ता
सैय्याद को भी बागबां बताते हैं लोग ।

               --- अजय गौतम 'आहत'

Tuesday, June 2, 2020

स्वच्छंद

ख्याल करूँ
या फिसल जाऊं
बवाल करूँ
या संभल जाऊं

दुनिया के सब भंडारे
नंगी दुनिया ढक तन सारे
चिल्लम चिल्ली चारो ओर
कौन सुने मन का शोर

भाग रहा कौन गोलाकार
परिधि परिधि कुलांचे मार
त्रिज्या जितनी दूरी है
कितना भी चल ले 2πR.

मेरा जूता मेरा पहिया
सिग्नल सिग्नल क्यूं रुकता जाऊं
चित पानी चित नदिया
पाटों में क्यूं बहता जाऊं

आंखें-आंखें लाल लाल
लहू-लहू करे सवाल
अंदर की जो ज्वाला है
ज्वाला नहीं ये हाला है

ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या
फिर किसका किससे पाला है
सत्यं ब्रूयात प्रियं ब्रूयात
ये कैसा गड़बड़झाला है

इंसान जने इंसान बने
ऊपर किसको बिठाला है
कदम कदम क्या बंधन है
जस मकड़ी का जाला है

समझना चाहूँ छंदमुक्त हो जाऊँ
इससे मुक्ति होती,
पर एक ही बात समझ में आयी
नेति नेति, नेति नेति ।


-- अजय गौतम 'आहत'



(जने -जनना-पैदा करना)


Friday, April 28, 2017

सात पोहे

पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ पंडित भया न कोय ।
न्यूज़ में हॉनर किलिंग पढ़ा, प्रेम कभो न होय ।।

मेरी भव-बाधा हरौ राधा नागरि सोइ ।
संसद में सोइ के जागौ जाग जाग के सोइ ।।

कहत नटत रीझत खिजत मिलत खिलत लजियात ।
भरे टॉकीज़ में पकड़े डैडी बस दे लातम-लात ।।

कुंभ में जल जल में कुंभ बाहर भीतर पानी
फूटा कुंभ डेढ़ सौ नुकसान औ कमरा में बस पानी पानी

बड़े बड़ाई न करे बड़े न बोले बोल ।
पहले सर्कास्टिक कमेंट लिखें बाद में लिख दे लोल ।।

करत करत अभ्यास ते जड़मति होत सुजान ।
फेल भये अस कूटा गयेन हथवा गोड़वा सुजान ।।

अति का भला न बोलना, अति की भली न चूप ।
भैया एक पालक पनीर मलाई कोफ़्ता चार बटर नान दो मिस्सी मिक्स रायता और स्टार्टर में सूप ।।

                                   -- अजय गौतम 'आहत'




नोट: पहली पंक्तियाँ प्रसिद्ध कवियों के दोहे की हैं। जस्ट फ़ॉर फन !

Friday, February 20, 2015

अशर्फियाँ सब सड़क पर बिखरा दो
शराफत सब दीवार में चुनवा दो
मुझे जल जल कर कुंदन नहीं बनना
भर भर कर प्याला बस ज़ाम पिला दो ..


                   --- अजय गौतम 'आहत ' 

Monday, September 29, 2014

सर्वविनाश

तुम प्रकाश उपासक हो
मैं अंधकार का शासक हूँ

तुम पर्वत शीतल शीतल
मैं आग उगलता ज्वाला हूँ
तुम हिमनदी से उज्जवल
मैं एकदम काला काला हूँ

.........
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-- अजय गौतम 'आहत '

Sunday, April 6, 2014

प्यार हमसे भी थोडा जता दीजिये

तुम कहो या चुप ही रहो
बात दिल तक जरा पहुंचा दीजिये
हम सदियों से प्यार करते रहे
प्यार हमसे भी थोडा जता दीजिये  ।

एक कुमुदुनी दिनभर परेशान है
आस का सूरज ढलता गया
कुछ ऐसी सियासी हवाएं चली
उसका भंवरा कहीं दूर उड़ता गया,
हम तुम दोनों जुदा हो गए
ऐसी बातों को न हवा दीजिये

प्यार हमसे भी थोडा जता दीजिये ।

एक मछली किनारे पे आके गिरी
उसका साथी था जाल में कहीं
बोली मुझको भी ले चलो आदमी
उसके पैरों पर वो रोने लगी,
तुझको मुझसे मिलने से रोके
ऐसी जालों को फ़ना कीजिये

प्यार हमसे भी थोडा जता दीजिये । 

रेत पर जो थे पाँव के निशां
मेरे पाँव उस पर पड़ते गए
वो हसीं वादियां वो हसीं पल
सारे  रेत में बदलते गए
रेत भी वक़्त बताने लगे
अपने हाथों से रेत गिरा दीजिये

प्यार हमसे भी थोडा जता दीजिये ।

देखो ये घटायें  उदास हैं
परिंदे भी सब चुप से हुए
तुम जो थोड़े से हुए ग़मगीन
फूल सारे  मुरझा से गए
ये रोते हुए सब हंसने लगे
आप थोडा सा मुस्कुरा दीजिये

हम सदियों से प्यार करते रहे
प्यार हमसे भी थोडा जता दीजिये ।


                      ---- अजय गौतम 'आहत '

Thursday, March 6, 2014

दिल करता है पी जाऊं
मेरी ख्वाहिशें
मेरे अरमान..
आज साकी बना कोई  ऐसा ज़ाम..

                 --  अजय गौतम 'आहत '

Wednesday, February 5, 2014

मेरा ही तो नाम था


कभी दिल पर चोट सह गए
कभी रात भर आराम था
वो जो महफ़िल में तुम भूल गए
वो मेरा ही  नाम था ।

कागज़ पर स्याही की तुम
धड़कने पढ़ते गए
लफ़्ज़ों को बार बार होंठो से चूमते गए
वो चिट्ठियां सब मेरी थी
बस नाम ही गुमनाम था..

वो जो महफ़िल में तुम भूल गए
वो मेरा ही तो नाम था ।

हर रोज़ तेरे दर पर
गुलाब आते रहे
तुम जहाँ जहाँ गए पलके बिछाते रहे
तुझे इल्म भी न हुआ
और मैं आशिक़ बदनाम था..

वो जो महफ़िल में तुम भूल गए
वो मेरा ही  नाम था ।

कभी दूर ले गए कदम
कभी पास खींच लाये तुम
वो जो अरसे बाद मिला था मैं
वो मेरा आखिरी सलाम था..

वो जो महफ़िल में तुम भूल गए
वो मेरा ही नाम था ।

                          ----  अजय गौतम 'आहत '

Sunday, December 22, 2013

सोचेंगे हम



इश्क की जालसाजी में क्या खोया क्या पाया
फुरकत में जब फुरसत होगी तो सोचेंगे हम..

ये सिगरेट के धुंए के छल्ले हैं या माथे की लकीरें
इक  कश तो गहरी लेने दे तो सोचेंगे हम..

शराब में नशा तेरे इश्क से कम तो नहीं
इक घूंट तो ज़रा चढ़ने दे तो सोचेंगे हम..

ये आँखों की बेरहमी है या इश्क़ का ग़म
ज़रा आँसूं तो थमने दे तो सोचेंगे हम..

भागते रहे उम्र भर मंजिल न मिली क्यूँ
थकेंगे जब कदम 'आहत'  तो सोचेंगे हम..

   

                                 --- अजय गौतम 'आहत '

(फुरकत =  Separation )

Tuesday, December 17, 2013

प्रेम पत्र

प्रिय,
मुझे आज भी याद है वो वक़्त जब मैं अपने इश्कबाज़ दोस्तों के बीच खुद को minority महसूस करता था । फिर एक दिन तुम सामने से आई । तुम्हारी progressive चाल देखकर मैं अपना हाल भूल गया । पहली बार जब तुमसे बात हुई तो तुम्हारे  liberal thoughts सुनके मेरा पूरा Constitution हिल गया । तब से लेकर आज तक, सिर्फ तुम्हे इम्प्रेस करने के लिए, खुद में न जाने कितने amendments कर चुका हूँ। 

तुम्हारे विचारों को जानने हेतु मैंने कुछ सप्ताह पहले लिखित रूप से  RTI file किया । किन्तु न जाने तुम किस secrecy की दुहाई देकर मेरा आवेदन टाल रही हो । प्रिय तुम किस सोच में डूबी हो । तुम्हे अपने democratic दिल का  President बना के रखूँगा और मैं तुम्हारा PM बन के रहूँगा । तुम्हारे नाम से मेरा काम होगा और मेरे काम से तुम्हारा नाम । 

तुम्हारी तरफ से कोई संकेत न आने से , मैंने हिम्मत करके तुम्हारे दिल के दरबार में  प्यार का Petition डाल ही दिया । सोचा जो होगा सो होगा । पर कब तक सनी देओल की तरह तारीख पर तारीख मिलती रहेगी My Doll !   कब लाओगी Reforms अपने  Judicial  System में | कल तुम्हारे घर का नौकर बाज़ार में मिला था । सुना है तुम्हारे  खूसट पिताजी किसी लोकपाल से तुम्हारी शादी भिड़ाने की सोच रहे हैं । प्रिय जल्दी ही अपना निर्णय मुझे बताओ । कहीं तुम्हारी माताजी ने भी लोकू को pass कर दिया तो अनर्थ हो जायेगा ।

प्रिये तुम इतनी hot हो कि मैंने प्यार से तुम्हारा नाम global warming रख दिया है (blush) | आजकल तो मेरे दोस्त भी मुझे थर्मामीटर कह के चिढ़ाते हैं । Darling ये ख़त मैं तुम्हारे नौकर के हाथ भिजवा रहा हूँ । कल इस ख़त का जवाब जरूर भेज देना ।

                                      मुआह मुआअहह मुआआह्ह्ह्ह ..
                                                                                                                                   
                                                                                                     सिर्फ तुम्हारा
                                                                                                   पागल  प्रेमी (blush)

Friday, October 11, 2013

जरा प्रहार करना

समय है अभी समर है अभी
तेरी दोस्ती का असर है अभी
बहुत हुआ छुप छुप कर वार करना
हूँ सामने अब मित्र जरा प्रहार करना ..
             
                -- अजय गौतम ' आहत '

Tuesday, July 23, 2013

जो तेरी बात चले ..

मुझको याद है वो राहें जो तेरे साथ चले
फूलों को भी खुशबू आये जो तेरी बात चले

कश्मकश में रहता हूँ ख़त लिखू  न लिखू
कलम खुद ही चल जाये जो तेरी बात चले


. . . . . . .







                        ----  अजय गौतम ' आहत '

Sunday, October 14, 2012

जुदाई

दुपट्टे का लहराना है या ख़त भेजा हवाओं में,
मैं अपना कुछ सबब खोजू तेरी इन अदाओं में

...........


         
                             --- अजय गौतम ' आहत  '

Tuesday, January 24, 2012

तेरे दिल का हाल प्रिये



जब तुम घर से निकलोगे 
पर मुझको न पाओगे 
जब बेचैन निगाहों से
गली का कोना छानोगे
जब तुम यूँ अकेले में 
कोई उदास गीत गुनगुनाओगे, 

जब तुम बात बात पर 
घर पर मिलने आओगे,
पर मुझको न पाओगे

तब मैं पूछूँगा तुझसे तेरे दिल का हाल प्रिये ।
.......



                        ------  अजय गौतम 'आहत'


Tuesday, November 22, 2011

बेवफा

खुदा तारीफ करू क्या तेरे इंसाफ की ,
बेवफा कोई और, तबाह कोई और ...




                                      -----अजय गौतम 'आह़त